-: श्रीरामकथा श्रवण एवं श्रीरामनाम संकीर्तन की महिमा :-

राम नाम सुमीरो भक्ता, राम नाम सुमीरो

श्रीरामकथा इस कलियुग में मनुष्यों को भव से पार ले जाने के लिए एक सुन्दर नाव के समान है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने लिखा है कि ‘भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ताकर दृढ नावा’ विभिन्न युगों में भव से पार जाने व भगवान को प्रसन्न करने के लिए मनुष्यों व संतों ने भिन्न भिन्न साधनों को अपनाया, जैसे सतयुग में तप, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा तथा कलियुग में श्रीरामकथा श्रवण व श्रीराम नाम संकीर्तन। अन्य युगों में मनुष्यों एवं ऋषि मुनियों को जो फल लाखों वर्ष तक कठिन तपस्या करने से प्राप्त होता था वही फल अब इस कलियुग में भगवान श्रीराम की कथा का श्रवण व उनके श्रीनाम संकीर्तन से बड़ी ही आसानी से प्राप्त हो जाता है। बशर्ते इसे प्रेम व श्रद्वापूर्वक सुना व स्मरण किया जाय, क्योंकि भव से पार जाने के लिए कलियुग जैसा कोई अन्य युग नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने बहुत ही मार्मिक ढंग से लिखा है-
दो0-कलियुग सम जुग आन नहिं, जो नर कर विश्वास,
गाइ राम गुन गन विमल, भव तरि बिनहिं प्रयास।
चौ0-‘राम कथा सुन्दर करतारी। संसय विहग उड़ावनहारी’।
रामकथा कलि विटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी।
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रन्ध्र अहि भवन समाना।

जो लोग विश्वास करते है, उनके लिए कलियुग के समान अन्य कोई दूसरा युग नहीं है। क्योकि इस युग में वे श्रीराम के पावन चरित्रों को गाकर और सुनकर बिना किसी अन्य प्रयास के ही भव से पार हो जाते है। श्रीराम की कथा हाथ की सुन्दर ताली के समान है। जो संदेह रूपी पक्षियों को उड़ा देती है। भगवान शंकर ने माता पार्वती से कहा, हे उमा श्रीराम कथा कलियुग रूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। जिन लोगों ने श्रीराम कथा नहीं सुनी उनके कानों के छिद्र सर्प की बिल के समान है।
दो0-कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरू जोग
जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।

कहने का तात्पर्य यह कि सतयुग त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में केवल भगवान के नाम स्मरण से प्राप्त होती है। गोस्वामी जी ने और भी लिखा है-
चौ0-कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।
अतः श्रीराम कथा इस घोर कलिकाल में मनुष्यों को क्यो आवश्यक है इसके विषय में रामायण में एक कथा इस प्रकार आती है।
एक बार देवर्षि नारद जी पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे। उन्होनें पृथ्वी वासियों को विभिन्न प्रकार के कष्टों से दुखी देखकर स्वयं भी बहुत दुखी हुए। वह दुखी मन से भगवान श्री विष्णु जी के पास गये। उनको प्रणाम करने के बाद उनसे कहा प्रभू सतयुग, त्रेता और द्वापर की तरह कलियुग के लोगों में भक्ति व साधना करने की उतनी क्षमता नहीं है अर्थात वे कठिन तपस्या नहीं कर सकते। ऐसे में उनका कल्याण कैसे हो सकता है, इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि नारद कलियुग जैसा तो कोई दूसरा युग ही नही है। क्योंकि इस युग में जो मेरे राम नाम का संकीर्तन एवं श्रीराम कथा का श्रवण करेगा वह बिना प्रयास ही सभी पापों से छूटकर मेरे सानिध्य को प्राप्त कर लेगा। यह सुनकर नारद जी बहुत प्रसन्न हुए। तभी से पृथ्वी पर कलियुग में श्रीराम की कथा का आयोजन व श्रीराम नाम संकीर्तन का आयोजन किया जा रहा है। श्रीराम कथा मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाती है। जो लोग प्रेम से श्रीराम कथा का श्रवण करते हुए उनके चरित्रों का अनुसरण करते हैं उनके हृदय में भगवान श्रीराम, सीता सहित सदैव निवास करते है। उनके जीवन में कभी भी कोई संकट नहीं आता है। उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। श्रीराम कथा श्रवण करने वाले भक्त का प्राण यमराज व उनके दूत नहीं ले सकते। उनका प्राण लेने के लिए भगवान श्री विष्णु के पार्षद आते है। भगवान श्रीराम का नाम विधि पूर्वक स्मरण करने पर तो फलदायी होता ही है। यदि कोई व्यक्ति धोखे सें भी स्मरण कर लेता है तो वह भी सभी पापों से छूटकर तर जाता है। गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज ने इस बात को बहुत ही मार्मिक ढंग से लिखा है--
दो0-तुलसी जिनके मुख से धोखेउ निकलै राम,
तिनके पग की पगतरी मोरे सर का चाम।

अर्थात जिन लोगो के मुख से धोखे से भी श्रीराम का नाम उच्चारित हो जाता है उसके पैर की जूती मेरे सिर के समान है। रामनाम महामंत्र में ऐसी ताकत है। जिस प्रकार विष को चाहे जान बूझकर या अनजान में पान किया जाय दोनों ही स्थिति मेे मनुष्य की मौत निश्चित है। उसी प्रकार भगवान श्रीराम का नाम है जिसका उच्चारण चाहे जानबूझ कर या धोखे में स्मरण किया जाय दोनों ही रूप में कल्याण करता ही हैै।