अपने कर्मो का फल भोगता है जीवःरामप्रसाद महाराज

( क्रमश:)

श्री लक्ष्मण जी कहते फिर कहते है
चौ0-अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहिं बादि देइअ दोसू। मोह निशा सबु सोवनहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारां।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी। जानिअ तबहि जीव जग जागा। जब सब विषय विलास बिरागा।
होई विवेक मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा। सखा परम परमारथ एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।
राम ब्रहम परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा। सकल बिकार बिरत मतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।
दो0- भगत भूमि भूसुर सुरभि, सुर हित लागि कृपालु। करत चरित धरि मनुज तन सुनत मिटहिं जग जाल।

ऐसा बिचार करके मनुष्य को क्रोध नहीं करना चाहिए और न ही किसी को इसके लिए ब्यर्थ में दोष ही देना चाहिए। संसार के सभी लोग मोह रूपी रात्रि में सोने वाले है जिन्हे सोते हुए अनेक प्रकार के स्वप्न दिखाई देते है। इस जगत रूपी रात्रि में सिर्फ योगी लोग ही जागते है। जो परमारथी हैं और मायाजाल से छूटे हुए है। जगत में जीव को जगा हुआ तभी जानना चाहिए। जब उसे सम्पूर्ण भोग विलास से बैराग्य हो जाय।
विवेक होने पर मोह रूपी भ्रम भाग जाता है और श्री रघुनाथ जी चरणों में प्रेम हो जाता है। हे सखा मन बचन और कर्म से श्रीराम जी के चरणाों में प्रेम होना यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ यानि पुरूषार्थ है।
श्रीराम जी परमब्रहम है। वे जानने में न आने वाले और स्थूल दृष्टि से देखने में न आने वाले अनादि अनुपम तथा सब बिकारों से रहित भेद शून्य है। वेद जिनका नित्य नेति-नेति कहकर निरूपण करते है। वही कृपालृ श्रीराम चन्द्र जी भक्त भूमि ब्राहम्ण गौ और देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके लीलाएं करते है। जिनके सुनने से जगत के जंजाल मिट जाते है। इसलिए हे सखा मोह को त्याग कर श्रीराम चन्द्र जी के चरणों में प्रेम करो।