अपने कर्मो का फल भोगता है जीवः रामप्रसाद महाराज

 

तीर्थराज प्रयाग के सुप्रसिद्व कथावाचक पूज्य संत श्री रामप्रसाद जी महाराज ने श्रीराम सीता व लक्ष्मण सहित वन को जाते समय श्रृंगवेरपुर में रात्रि शयन के समय निषादराज जी द्वारा लक्ष्मण से यह कहने पर कि कैकेयी ने श्रीराम व सीता को बहुत बड़ा दुख दिया का उत्तर देते हुए लक्ष्मण जी ने निषादराज से कहा कि हे मित्र कोई किसी को सुख व दुख नहीं देता बल्कि सभी लोग अपने अपने कर्मो का फल भोगते है। रामायण में केवट व लक्ष्मण जी के इस प्रसंग को लक्ष्मण गीता के नाम से जाना जाता है। जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने इस प्रकार लिखा है।
काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।
जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।
जनम मरन जहॅ लगि जग जालू। संपति बिपति करम अरू कालू।
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु सब लगि व्यवहारू।
जानिअ सुनिअ गुनिअ मनमाही। मोहमूल परमारथ नाथी।
दो0-सपने होई भिखारि नृप, रंक नागपति होई
जागे हानि न लाभ कछु तिमि प्रपंच जिय जोई।

निषादराज से श्री लक्ष्मण जी समझाते हुए कहते हैं कि हे सखे संयोग वियोग भले बुरे भोग शत्रु मित्र और उदासीन ये सभी भ्रम के फंदे हैं। जन्म मृत्यु संपति विपत्ति कर्म और काल ये सभी संसार के जंजाल है।
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहां तक व्यवहार हैं जो देखने सुनने और मन के विचार में आते है। इन सब का मूल अज्ञान ही है। जैसे स्वप्न में कोई राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्ग का इन्द्र हो जाय। लेकिन जागने के बाद हानि व लाभ कुछ नहीं होता। उसी तरह इस जीवन के दृश्य प्रपंच को देखना चाहिए।

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