-: दान करने की महिमा :-

तुलसी पक्षिन के पिये घटै न सरिता नीर,
दान किये धन ना घटे जो सहाय रघुबीर।

दान न देने से मनुष्य को क्या दण्ड मिलता है इसकी कथा आनन्द रामायण के सप्तदश स्कन्ध में बड़े ही विस्तार से वर्णित है। दण्डकारण्य स्थित एक तालाब के किनारे एक बार महात्मा अगस्त्य जी पूजा कर रहे थे। उसी समय आकाश से एक स्वर्गीय प्राणी दिव्य पुरूष विमान से उतर कर तालाब के किनारे जाकर मुर्दे की मांस को नोचकर खाने लगा। वहां मौजूद महात्मा अगस्त्य जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होने उसे अपने पास बुलाकर पूछा कि आप रहते स्वर्ग में हो लेकिन कर्म राक्षस का करते हो। इसका क्या रहस्य है। उनकी बातों को सुनकर उस स्वर्गीय प्राणी दिव्य पुरूष ने अपने पूर्व जन्म की एक कथा सुनाई जो इस प्रकार है। प्राचीन काल में सुदेव नामक एक राजा राज्य करते थे । उनके दो पुत्र थे जिनमें एक का नाम श्वेत व दूसरे का सुरथ था।ं श्वेत मैं ही हॅू। पिता के मरने के बाद राज्य का भार मेरे ही उपर था। मै अपनी प्रजा का पालन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी से करता था। कभी प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट नही होने देता था। किन्तंु मै कभी कोई दान पुण्य व संत सेवा आदि नहीं करता था। एक दिन की बात है कि मै तालाब में स्नान करने गया और वहीं अचानक डूबने से मेरी मौत हो गयी। मेरे द्वारा अच्छा कार्य व प्रजा पालन करने से मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। मगर जीवन में कभी दान आदि न देने के कारण मुझे स्वर्ग का ं भोजन नहीं मिलता था। इस संबंध में जब मैने देवराज इन्द्र से बात की तो उन्होंने कहा कि आपने कभी किसी को कोई वस्तु दान नहीं दी है इसी वजह से स्वर्ग का भोजन आपको नहीं मिल रहा है। तब मैने उनसे पूछा कि मै अपना पेट कैसे भरूॅ इस पर देवराज ने कहा कि जब तक आप किसी को कोई वस्तु दान नही दे देते तब तक आपको अपने ही शरीर का मांस खाना पड़ेगा। आपका शरीर उस तालाब में तब तक सुरक्षित रहेगा। तभी से मैं स्वर्ग से प्रतिदिन उक्त तालाब में आकर अपने ही शरीर का मांस खाकर अपनी भूख को शांत करता हॅू। उस दिव्य पुरूष ने कहा कि यदि मै यह कड़ा किसी को दान में दे दूॅ तो मुझे स्वर्ग का भोजन मिलने लगेगा। इस पर अगस्त्य जी ने कहा कि तब तो आप किसी पात्र व्यक्ति को यह कड़ा दान देकर अपना अभीष्ट सिद्व कीजिए। इस पर उस दिव्य आत्मा ने कहा कि आपसे अच्छा पात्र संसार में कौन मिल सकता है यह कहते हुए उस दिव्य पुरूष ने अपने हाथ का कड़ा निकाल कर उन्हें दान में दे दिया। दान देते ही उसे स्वर्ग का भोजन मिलने लगा और उसी दिन से दिव्य पुरूष का स्वर्ग से पृथ्वी पर आकर अपने ही शरीर का मांस खाना बंद हो गया। कहने का तात्पर्य यह कि मनुष्य को धनार्जन करने के साथ ही दान पुण्य भी करना चाहिए। ऐसा न करने से पाप लगता है तथा अंत में अपने ही शरीर का मांस खाना पड़ता है।