-: अमृतवाणी :-(1)

जीवन में अपनायें-

1-जीवन का अर्थ है समय, जो जीवन से प्यार करते हैं। वे आलस्य में समय न गवायें।
2-सार्थक और प्रभावी उपदेष वह है जो वाणी से नहीं वरन अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है।
3-जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है।
4-कथा सत्संग में रत रहने वाले भक्त का प्राण यमराज नहीं हरते।
5-जो बातें विचार कर छोड़ दी जाती है वे कभी नहीं पूरी होती।
6-अंत समय में जीव के साथ सिर्फ उसके द्वारा किया गया सत्कर्म ही जाता है।
7-यह सच है कि संसार बाहर से बहुत सुन्दर है परन्तु अपने मूल रूप मे ंयह अत्यन्त वीभत्स है। इस संसार में सभी वस्तुओं का अन्त दुख में होता है। अतः इस संसार की कोई भी वस्तु मन को सच्ची षांति नहीं प्रदान कर सकती।
8-जैसे वर्शाकाल में नदी में भंवरों की एक श्रष्ंखला पैदा हो जाती है, वैसे ही धन भी मूढ़ जनों को अहंकार और दर्प के भंवर में चक्राकार धूमाता रहता है।
9-जैसे नदी में लहरे पैदा होती है वैसे ही धन से असंख्य चिन्ताओं की उत्पत्ति होती है। वह भी लहरों के समान ही मनुश्य को अस्थिर बना देता है तथा उसे दुश्कर्मो की ओर प्रवष्त्त कर देता है।
10-जिस प्रकार एक रत्न राख में ढका होने के कारण मलिन हो जाता है, वैसे ही विद्वान योद्वा सौम्य और कष्तज्ञ व्यक्ति जब धन संचय करते हैं तब वे भी अपने स्वभाव का परित्याग करते हुए भ्रश्ट हो जाते है।
11-जैसी विशैली बेल मष्त्यु का करण बन जाती है, वैसे ही सांसारिक सम्पदा आनन्द के स्थान पर मात्र दुख ही प्रदान करती है। यदि व्यक्ति अपनी समस्त षक्तियों को केवल अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा में ही लगा दे तो उसकी आत्मा के खो जाने की संभावना उत्पन्न हो जाती है।
12-मूढ़ अपने हष्दय में अनुभव करता है कि धन ही परम कल्याणकारी तथा सुख का एक मात्र मार्ग है। वास्तव में वह अज्ञान दुख और सभी प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों का जनक है।
13-जिस प्रकार धूल रत्न को भी धूमिल कर देती है उसी प्र्रकार धन भी विवेकवान पुरूशों के सद्गुणों को दूशित कर देता है।
14-लक्ष्मी इन्द्रधनुश के समान चलायमान रंगों से मनुश्यों को विमुग्ध करती है। वह बिजली के समान चंचला होती है।
 

 

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